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भोजपुरी में पढ़ें – चिरुकी माने चुटिया रखला के महत्व

कई गो पवित्र साधु- सन्यासी मुड़ी छिलवा के साधना में लीन रहेला लोग आ कई गो जटा- जूट राखि के. त बहुत आदमी के मन में सवाल उठेला कि एकरा पीछे का रहस्य बा? त ई दूनो तरह के परंपरा बहुते पवित्र आ गहिर अर्थ वाला बा. आईं आजु एकरा भीतर झांकल जाउ. बाकिर सुरु करे के पहिले तनकी भर बिसयांतर करे के इजाजत दीं. रउरा त जानते बानी कि सोरह गो (षोडस) संस्कारन में से एगो ह- मुंडन संस्कार. एही के चूड़ाकर्म संस्कार भी कहल जाला. संतान के जनम लिहला पर ओकरा गर्भ से पावल कपार के बार एक, तीन, पांच भा सात साल का बाद विधि- विधान का साथे छिलवा दिहल जाला. मुंडन संस्कार खातिर द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी आ त्रयोदशी तिथि शुभ मानल बा. अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, पुनर्वसु, चित्रा, स्वाति, ज्येष्ठ, श्रवण, धनिष्ठा आ शतभिषा नक्षत्र में मुंडन संस्कार के श्रेष्ठ कहल बा. कहाला कि माता के गर्भ में संतान के जौन बार मिलेला ऊ पूर्व जनम के पाप वगैरह के भी ले के आवेला. पूर्व जनम के पापमुक्ति खातिर मुंडन संस्कार होला. कहाला कि मुंडन के बाद जौन नया बार जामी ऊ ब्रह्मांड ऊर्जा के माध्यम से जातक के फायदा पहुंचाई.

जौन साधु- संत लोग मुड़ी पर बार ना राखे ओह लोगन के पहिली मान्यता ह कि बार छिलववला पर सहस्रार चक्र (जौन कि मस्तिष्क में होला) का ओर ब्रह्मांडीय ऊर्जा के आकर्षण बढ़ि जाला. दोसरकी मान्यता ह कि कपार के बार संसार खातिर मिलल बा. साधु- सन्यासी त संसार से विरक्त रहेला लोग. त कपार पर बार ना रहे के चाहीं. तिसरकी मान्यता ह कि कपार पर बार रही त ठीक से देखभाल करे के परी. रूसी वगैरह के झंझट बा. बार के मेंटेन करे में समय बरबाद कइला से बढ़िया बा कि ऊ समय साधना में लगावल जाउ. ई त भइल मुंडन वाला साधु- संत के परंपरा. जैन धर्म में केशलोंच के परंपरा बा. एह प्राचीन परंपरा में जैन साधु लोग अपना कपार आ मूंछ के बार अपना हाथ से नोचि के हटा देला. ई साधना बड़ा कष्टकारी ह. बाकिर मान्यता बा कि एह साधना से अनजाने में जौन पाप भइल बा ऊ खतम हो जाला आ आत्मा शुद्ध हो जाले. कई गो बड़े- बड़े संत मुंडन कराइए के रहत रहे लोग. आजुओ ई परंपरा चलता. जैन संत लोगन के त्याग आ तपस्या के बहुते उदाहरण बा. ओह लोगन के बारे में पढ़ि के प्रेरणा मिलेला.

अब आईं जटा- जूट वाला साधु- संत के मान्यता जानल जाउ. हमनी के सनातन धर्म में चोटी भा चिरुकी (शिखा) राखे के परंपरा बा. दैनिक पूजा- पाठ में त एगो श्लोक के पढ़ले जाला, मुंडन संस्कार का घरी चोटी रखवा के पूजा का समय भी ईहे श्लोक पढ़ल जाला-

ऊं चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते.
तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजोवृद्धि कुरुष्व मे ..
(भावार्थ- दिव्य तेजोमयी महामाया शिखा के बीच में निवास करसु आ बुद्धि तेज करसु).

लंबा बार भा जटा- जूट वाला साधु- संत के कहनाम बा कि मनुष्य के दिमाग के दू गो हिस्सा होला. एह दूनो हिस्सा के संधि स्थान जहां मस्तिष्क के ई दूनों हिस्सा मिलता, बहुते संवेदनशील होला. बहुत ठंढा भा गर्मी से एह हिस्सा के सुरक्षित राखे खातिर शिखा बहुत उपयोगी होले. साधु लोगन के जटा- जूट के एगो अउरी लाभ बतावल बा. योगशास्त्र में इडा, पिंगला आ सुषुम्ना नाड़ी के चर्चा बा. इड़ा मेरुदंड के बाएं, पिंगला मेरुदंड के दाएं आ सुषुम्ना नाड़ी बीच में बिया. सुषुम्ना ज्ञान आ अध्यात्म के नाड़ी ह. ई मेरुदंड से होके मस्तिष्क में जाले. एह नाड़ी के मस्तिष्क से मिलन स्थल पर शिखा राखल जाला आ कई लोग शिखा बान्हि के राखेला. पातर शिखा के कम महत्व रहेला. बड़का गोलाई वाली शिखा सहस्रार चक्र के समेटि लेले. मान्यता ह कि शिखा दिमाग के ऊर्जा तरंग के रक्षा करेले आ आध्यात्मिक शक्ति बढ़ावेले. सन्यासी लोग कहेला कि जटा- जूट ब्रह्मांडीय ऊर्जा के खींच के सहस्रार चक्र के समृद्ध करेला. भगवान शिव के जटा- जूट बहुते प्रसिद्ध ह. भगवान कृष्ण भी लंबा बार वाला बाड़े. एकरा अलावा कई गो बड़े- बड़े सन्यासी लंबा बार राखत रहे लोग. अभियो ई परंपरा जारी बा. बर के पेड़ (वट वृक्ष) के जटा के बहुते पवित्र मानल जाला आ वट के पूजा भी कइल जाला. योग शास्त्र के जानकार बिद्वान ईहो कहेला लोग कि जौना संत के समाधि लाभ मिलेला ओकर मुड़ी के लंबा बार भा जटा- जूट ब्रह्मांडीय ऊर्जा के तरंग बनि जाला शरीर में ई आध्यात्मिक ऊर्जा आसानी से पहुंचे लागेला. एकर अर्थ ई भइल कि जटा- जूट भा लंबा बाल आध्यात्मिक एंटीना के काम करेला. गृहस्थ लोग जटा जूट राखल त व्यावहारिक नइखे, लिहाजा चिरुकी राखे के बात कहल जाला.

त आखिर में ईहे परिणाम निकलल कि मुंडन कराके रहे वाला संत भी महान ह लोग आ लंबा बार भा जटा- जूट वाला संत भी महान ह लोग. काहें से कि दूनो तरह के महात्मा लोगन के भक्ति यात्रा प्रबल आकर्षण के साथे भगवान के तरफ जा रहल बा. दर्शन भा फिलासफी भले अलग- अलग होखे, लक्ष्य एकही बा. आनंद त तब आवेला कि दूनों तरह के साधु- संत आपस में एतना प्रेम आ सौहार्द्र का साथे रहेला लोग कि लागेला कि ओह लोगन के ई ध्यान नइखे कि के मुंडन करवले बा भा के जटा- जूट रखले बा. ध्यान बस एतने बा कि के कतना ईश्वर प्रेम में डूबल बा.

(डिसक्लेमर – लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

Tags: Bhojpuri article

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