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यहां श्मशान घाट में प्रकट हुआ था शिवलिंग, 16वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया

अंकित राजपूत/जयपुर. जयपुर शहर विश्वधरोहर शहर है यहां की ऐतिहासिक इमारतों से लेकर भव्य और शानदार मंदिर बने हुए हैं. जिसके कारण जयपुर को छोटी काशी भी कहा जाता हैं. गुलाबी नगरी में हर ऐतिहासिक धरोहरों और मंदिरों को शानदार तरीके से सहेजकर रखा गया है. ऐसे ही जयपुर के चौड़ा रास्ता बाजार में स्थित भगवान शिव को समर्पित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जिसका इतिहास जयपुर के बसाने से भी पहले का है. यह मंदिर 16वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया था.

इस शिव मंदिर की स्थापत्य कला में राजस्थानी स्थापत्य और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है. इस मंदिर के बारे में कहा जाता हैं कि जिस स्थान पर यह मंदिर बना हुआ है. उस स्थान पर किसी समय श्मशान घाट और भारी संख्या में ताड़ के वृक्ष हुआ करते थे. इस मंदिर में भगवान शिव का शिवलिंग स्वयंभू प्रकट हुआं था. इस शिवलिंग के सबसे पहले दर्शन एक मंदिर के पुजारी ने ही किये थे. बाद में इस मंदिर का निर्माण भव्य रूप में किया गया.

इस मंदिर की अनोखी मान्यता
यह मंदिर बाजार के बीचों बीच बना हुआ है. इस मंदिर की वास्तुकला और डिजाइन उस समय के जयपुर रिसायत से वास्तुविद विद्याधर जी ने इसके निर्माण की रूपरेखा तैयार की थी. इस मंदिर को पहले ताड़कनाथ के नाम से भी जाना जाता था. इस शिव मंदिर के प्रति जयपुरवासीयों की गहरी आस्था है. और यहां पूरे सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है. इस मंदिर की एक विशेष मान्यता है कि भगवान शंकर के शिवलिंग को 51 किलों दुध और घी से अभिषेक करने से भगवान शंकर भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं साथ ही मंदिर में स्थापित भव्य नंदी महाराज को भक्त अपनी परेशानियां बताते हैं और नंदी महाराज भक्तों की समस्याओं को भगवान शिव तक पहुंचाते हैं.

साल भर लगा रहता है भक्तों का तांता
इस मंदिर में श्रावण महिने की तरह पूरे सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है. इस मंदिर के बारे में यहां के पुजारी बताते हैं कि जब से इस मंदिर की स्थापना हुई हैं. तब से यहां भगवान शंकर की अखंड ज्योत जल रही हैं जो आज भी बरकरार हैं. इस मंदिर में शिवरात्रि में पर्व पर देशभर से भगवान शंकर के दर्शन करने के लिए आते हैं यहां हर रोज हजारों की संख्या में भक्त आते हैं. मंदिर के बाजार के बीचों बीच होने के कारण और मंदिर के बाहर फूल माला और प्रसादी की दुकानों के कारण यहां हमेशा ट्रेफिक की समस्या बनी रहती है.

टाइम्स ऑफ़ हिंदी पर अद्यतन: इस मंदिर का 16वीं शताब्दी में आस्तित्व में आना एक विशेष घटना है. इसकी स्थापत्य कला राजस्थानी स्थापत्य और स्थानीय संस्कृति का अमालमाल मंगलमय उदाहरण है. भगवान शिव के शिवलिंग के निर्माण से इस मंदिर की महत्वपूर्णता बढ़ गई है. मंदिर बाजार में स्थित होने के कारण और अनोखी मान्यताओं के कारण यहां हमेशा भक्तों का तांता लगा रहता है.

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